अनेक देशों में लोकतंत्र के समक्ष सवाल पर भारत में यह मजबूत : राष्ट्रपति कोविंद

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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आज कहा कि ऐसे समय में जब विश्व के अनेक देशों में लोकतंत्र के सामने सवाल उठ रहे हैं, भारत में यह मजबूती के साथ खड़ा है। कोविंद ने गुजरात में नर्मदा जलिे के केवड़यिा में स्टेच्यू ऑफ यूनिटी के निकट आयोजित पीठासीन अधिकारियों के 80 वें अखिल भारतीय सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारत लोकतंत्र का जनक है। उन्होंने कहा कि भारत में लोकतंत्र की नींव मजबूत है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में गणतंत्र का उल्लेख मिलता है। बिहार के वैशाली और कपिलवस्तु का दुनिया के प्राचीनतम गणराज्य के रूप में जिक्र है।
राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में जनप्रतिनिधियों से लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। मीडिया के इस गतिशील युग में संसद और विधानसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया जाता है। ऐसे में जनता यह चाहती है कि जनप्रतिनिधि संसदीय प्रणाली का पालन करें। इस व्यवस्था में बजाय वाद-विवाद के संवाद से समाधान करें। शिष्ट संवाद के जरिए जन समस्याओं का निराकरण करते हुए काम करे। निष्पक्ष कार्यवाही अति आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भारत के लोकतंत्र को सशक्त बनाना सम्मेलन का उद्देश्य होना चाहिए। गरीब, दलित और पीड़ति के लिए कार्य होना चाहिए। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने ‘कहा कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभों को मजबूती से काम करना चाहिए। यह समारोह समयोचित है। इन तीनों स्तंभों के बीच संवाद का होना बेहद जरूरी है। जवाबदेही, सहयोग, समन्वय और विश्वसनीयता को संसदीय प्रणाली की आत्मा करार देते हुए उन्होंने कहा कि इन तीनों में बड़ा कौन है उसे लेकर चर्चा या खींचातानी की जरूरत नहीं है। न्यायिक संस्था अभिभावक है तो शेष दो स्तंभ एक- दूसरे के पूरक हैं।
इसलिए एक सामान्य उद्देश्य के लिए संवाद साधते हुए कार्य करना चाहिए। एक-दूसरे के पूरक बनकर सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए प्रयासरत बने। सभी में संविधान सर्वोच्च है। नायडू ने कहा कि चरित्र का स्थान भ्रष्टाचार ले रहा है, उस पर गंभीर चिंतना करना होगा। राजनीतिक दल इसे लेकर चिंता और चिंतन करें। लोकतंत्र की मजबूती के लिए हम एक हों। सदन में डिबेट यानी बहस, डिस्कस यानी चर्चा और डिसीजन यानी निर्णय पर ध्यान दिया जाए। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि भारत के संविधान के निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रेरणा और योगदान रहा है।
71वें संविधान दिवस की पूर्व संध्या पर सरदार की प्रतिमा के सान्निध्य में ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ परिसर में सभी का इस सम्मेलन में एकत्रित होना आनंद का विषय है। संसद में आम जनता की आवाज को मजबूती से उठाने की हम सभी कि जिम्मेदारी है। हमें यह देखना होगा कि विशेषकर तीनों स्तंभ-न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका साथ रहकर, समन्वय स्थापित कर और सुदृढ़ बनकर कार्य करे। लोकतंत्र में मतभेद हो सकते हैं, उसमें सुधार करते हुए इस संबंध में विचार कर सर्वसम्मति बनाने का हमारा प्रयास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि 26 नवंबर का दिन हमारे लोकतांत्रिक इतिहास का अहम दिन है क्योंकि यह दिन संविधान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। यह वर्ष पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का शताब्दी वर्ष भी है।
अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन की शुरुआत वर्ष 1921 से हुई थी। पिछले कई वर्षों के दौरान इस सम्मेलन के अंतर्गत लोकतांत्रिक प्रणाली को मजबूती देने के नजरिये से नए विचारों और नई प्रणाली के अनुभवों का आदान-प्रदान करने के साथ यह मंच अत्यंत प्रभावी साबित हुआ है। ज्ञातव्य है कि इस वर्ष दो दिवसीय सम्मेलन का विषय ‘मजबूत लोकतंत्र के लिए विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के मध्य सामंजस्यपूर्ण समन्वय’ है।
इसके अंतर्गत अनेक वर्तमान विषयों पर विचार-विमर्श के लिए तीन अलग-अलग सत्रों का आयोजन किया गया है जिसमें विधानसभा के पीठासीन अधिकारी वर्तमान परिस्थिति में देश में लोकतंत्र को और भी सशक्त बनाने के लिए शासन के तीन मूलभूत अंगों के बीच पारस्परिक सहयोग, सामंजस्य और समन्वय को अधिक प्रभावी और सुदृढ़ बनाने की जरूरत पर विचार करेंगे। कल समापन सत्र को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्बोधित करेंगे।

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