Friday , 19 October 2018

दिल्ली में ‘कूड़े के पहाड़’ और पानी में डूबी मुंबई पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में बढ़ते कूड़े और मुंबई में बाढ़ जैसे हालात को देखते हुए राज्य सरकारों को जमकर फटकार लगाई है. सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और मुंबई का जिक्र करते हुए कहा कि दिल्ली कूड़े के पहाड़ तले दबती जा रहा है और मुंबई पानी में डूब रही है, लेकिन यहां की सरकारें इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रही हैं. यहीं नहीं सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 10 राज्यों सहित दो केंद्र शासित प्रदेशों पर भी जुर्माना लगाया है. इन पर जुर्माना इसलिए लगाया गया है क्योंकि इन्होंने कोर्ट में एफिडेविट देकर यह नहीं बताया कि कचरे के प्रबंधन के लिए क्या कदम उठाए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केन्द्र और दिल्ली सरकार से बुधवार तक इस बारे में रुख स्पष्ट करने को कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में कूड़े के पहाड़ों  को साफ करने की जिम्मेदारी किसकी है. उपराज्यपाल अनिल बैजल के प्रति जवाबदेह अधिकारियों की या मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रति जवाबदेह अधिकारियों की? हम जानना चाहते हैं कि कूड़ा साफ करने के लिये जिम्मेदार कौन है, जो उपराज्यपाल के प्रति जवाबदेह हैं या जो मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह हैं.’’ शीर्ष अदालत ने यह निर्देश ऐसे समय दिया जब कुछ दिन पहले उसने उपराज्यपाल और आम आदमी पार्टी सरकार के बीच सत्ता संघर्ष पर फैसला सुनाते हुये व्यवस्था दी थी कि उपराज्यपाल के पास फैसले करने की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है और वह निर्वाचित सरकार की मदद एवं सलाह से काम करने के लिये बाध्य हैं.

न्यायमूर्ति एम बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा ‘‘अब, हमें फैसले का फायदा है. दिल्ली विशेषकर भलस्वा, ओखला और गाजीपुर में कूड़े के पहाड़ हैं. हम जानना चाहते हैं कि कूड़ा साफ करने के लिये जिम्मेदार कौन है, जो उपराज्यपाल के प्रति जवाबदेह हैं या जो मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह हैं.’’ सुनवाई शुरू होने पर पीठ ने केन्द्र की ओर से पेश अतिरिक्त सालिसिटर जनरल पिंकी आनंद और दिल्ली सरकार के वकील से पूछा कि कूड़ा प्रबंधन किसके क्षेत्राधिकार में आता है.

पिंकी आनंद ने कहा कि वह बुधवार को इस मुद्दे पर हलफनामा दायर करेंगी. शीर्ष अदालत ने कहा कि दिल्ली कूड़े के ढेर में दब रही है और मुंबई पानी में डूब रही है लेकिन सरकार कुछ नहीं कर रही है. उन्होंने ठोस कचरा प्रबंधन रणनीति पर अपनी नीतियों पर हलफनामा दायर नहीं करने पर दस राज्यों और दो केन्द्र शासित प्रदशों पर जुर्माना भी लगाया. इस स्थिति पर अपनी मजबूरी जाहिर करते हुये शीर्ष अदालत ने अफसोस जताया कि जब अदालतें हस्तक्षेप करती हैं तो न्यायाधीशों पर न्यायिक सक्रियता के नाम पर निशाना साधा जाता है.

उन्होंने कहा कि जब सरकार कुछ नहीं करती है या गैरजिम्मेदार तरीके से काम करती है तो क्या किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, कर्नाटक, मेघालय, पंजाब, लक्षद्वीप, पुडुचेरी पर कहने के बावजूद ऐफिडेविट न दाखिल करने पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. वहीं, कुछ राज्यों पर मामले की अनदेखी करने पर दो-दो लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है.