Thursday , 14 March 2019

नेताजी के विचारों को अपनाने की जरूरत

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के अत्यंत विशिष्ट एवं उल्लेखनीय व्यक्तित्व रहंे हैं। उन्होने भारत को अग्रेजों की पराधीनता से मुक्त कराने के लिए जीवन भर सतत प्रयास किए। उनकी संगठन क्षमता सर्वोच्च स्तर की थी। वह जन-मानस को अत्यंत तीव्रता से किसी खास उद्देश्य हेतु संगठित करने की अप्रतिम क्षमता रखते थे। स्वाधीनता आन्दोलन को उनकी देन इतनी विराट और प्रभावशाली रही है कि उसकी उपेक्षा करके भारत का कोई भी इतिहास स्वंय को प्रामाणिक नहीं कहला सकता है। सचमुख , सुभाष चन्द्र बोस भारतीय जनमानस की आत्मा में निवास करते हैं , जनता पर उनका प्रभाव इतना सशक्त था कि उनके एक आह्वाहन पर लोगों के समूह के समूह उनके पीछे करबद्ध हो चल पडते थे। सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी सन् 1897 को उडीसा के कटक नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम रायबहादुर जानकीदास बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। बालक सुभाष चन्द्र बोस की प्रारंभिक शिक्षा प्रोटेस्टेण्ट मिशनरी स्कूल और रेभेन्सा काॅलेजियट स्कूल में सम्पन्न हुई। सुभाष चन्द्र बोस का अन्तर्मन अत्यंत धीर – गम्भीर और भारतीय संस्कृति और सभ्यता के रंग में रंगा हुआ था। अतः यह अत्यंत स्वाभाविक सी बात है कि जिन स्कूलों में एजंल और गाड सेव द किंग की शिक्षा प्रदान की जाती हो उन स्कूलों में सुभाष चन्द्र बोस का देश भक्त हृदय कभी नहीं लगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही। एक बार उन्होंने अपने पिता जी से भी कहा थाः ‘‘इस स्कूल और इसकी पढ़ाई से मुझे घृणा हो गयी है। सुभाष चन्द्र बोस का यह कथन उस समय अपने में गंभीर अर्थों को समाए हुए था। सुभाष चन्द्र बोस इसी शिक्षा को भारतीय युवकों के लिए भ्रामक और विनाशकारी मानते थे, जिसमें अपने भारत देश की सभ्यता , संस्कृति , समाज और इतिहास का ज्ञान न देकर उनमें साम्राजयवादी मूल्यों और अंग्रेज – परस्ती के गुणों का प्रवेश कराया जाता है । सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी आगे की पढ़ाई प्रेसीडेन्सी काॅलेज और स्काटिश चर्च कालेज से पूरी की। स्काटिश चर्च काॅलेज से सन 1919 की बी.एस.सी. की परीक्षा में उन्होने पूरे विभाग में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। बाबू जानकी नाथ चाहते थे कि उनका पुत्र आई.सी.एस़ ़होकर सरकारी नौकरी में उच्च पद प्राप्त करे। पर सुभाष के मन में देश -प्रेम हिलोंरे ले रहा था। वे ब्रिटिश सरकार की नौकरी करना नहीं चाहते थे। लेकिन पिता के आदर्शों के सम्मुख उन्हें झुकना पड़ा। वे परीक्षा देने के लिए इंग्लैण्ड गए और केवल 8 महीने के अध्ययन में ही उन्होंने आई.सी. एस. की परीक्षा सम्मानपूर्वक उत्तीर्ण की और वरीयता सूची में चैथा स्थान प्राप्त किया। पिता की आकांक्षा तो उन्होंने पूरी कर दी, किन्तु अपनी अंतर्रात्मा की आवाज भी वे अनसुनी न कर सके। वे यह सोचते थे कि सिविल सर्विस में रहकर पराधीन देश की जनता की भलाई नहीं की जा सकती । अतः उन्होंने आई.सी.एस. से इस्तीफा दे दिया और भारत लौट आए। जिस समय सुभाष भारत लौटे , उस समय यहां गांधी जी का सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। बंगाल में देशबन्धु चितरंजन दास का बड़ा प्रभाव था। सुभाष बाबू ने उन्हें अपना राजनीतिक गुरू बनाया । प्रिसं आॅफ बेल्स का भारत आगमन होने वाला था । अंग्रेज सरकार उनके भव्य स्वागत की तैयारियों में लगी हुई थी। काग्रेंस ने इस स्वागत समारोह का बहिष्कार करने का निश्चय किया था। बंगाल में देशबन्धु तथा सुभाष बाबू के प्रयासों से सह बहिष्कार बहुत सफल रहा। सुभाष की अद्भुत संगठन शक्ति देखकर अंग्रेज सरकार हिल उठी । उसने उन्हें गिरफतार करके जेल में डाल दिया।छः महीने के बाद जब बाबू जेल से छूटे, उन्होंने के साथ मिलकर अपनी राजनैतिक गतिविधियां और तेज कर दी। असहयोग आन्दोलन बंद हो गया था और सभी नेता जेल से छूट गए थे। देशबन्धु की प्रेरणा से ‘‘ बांगलार कथा ’’ नामक पत्र निकाला गया। देशबन्धु ने दूसरा पत्र फारवर्ड भी निकाला और सुभाष को उसका प्रबन्धक बनाया गया। देश में जहां एक ओर गांधी जी का अहिंसात्मक आन्दोलन चल रहा था, वहीं दूसरी ओर क्रान्तिकारियों का सशस्त्र आन्दोलन चल रहा था। बंगाल और उत्तर भारत में इस आन्दोलन का विस्तार होने लगा था। सुभाष बाबू ने किसी न किसी रूप में इस दल से सम्बन्ध बनाए रखा। देश को स्वतंत्र कराने के लिए आजाद हिन्द फौज का निर्माण किया । 18 अगस्त 1945 को एक विमान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से उसकी मृत्यु हो गयी। लेकिन आज भी नेताजी की मृत्यु एक रहस्य बना हुआ है। भारतवासियों के हृदय में वे आज भी जिन्दा हैं और हमेशा ही रहेंगे और करोडो भारतवासियों को अपने मातृभूमि पर मर मिटने की प्रेरणा देते रहेंगे। आज स्वाधीनता के 72 वर्षों के पश्चात भी हमारे राष्ट्रीय जीवन को कुंठित करने के लिये सैकड़ों समस्याओं के ढेर लगे हुए हैं। गरीब और गरीब हो गए हैं जबकि मुट्ठी भर पूंजीपति,धनी लोगों की आमदनी बेतहाशा और बेशुमार बढ़ी है। बेरोजगारी निरंतर बढ़ती जा रही है। स्वास्थ्य और शिक्षा साधारण लोगों की पहुंच के बाहर है। देश की वास्तविक जनता के हाथ में सत्ता सौपने का कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ रहा है। राष्ट्रीय बुर्जुआवादी पूंजीपति वर्ग के प्रतिनिधि,साम्राज्यवादी ताकतों का समर्थन पा कर सत्ता चला रहे हैं। 1930 के दशक के प्रारम्भ से ही नेता जी सुभाषचन्द्र बोस विभिन्न मंचों से समाजवादी पुनर्निर्माण के वैकल्पिक साधनों की बात कहते आ रहे थे लेकिन स्वाधीनता के पश्चात हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने नेता जी सुभाषचन्द्र बोस के विचारों,सुझवों और उनके द्वारा बताए गए कार्यक्रमों पर चलने का प्रयास कभी नहीं किया। यद्यपि 1947 के बाद से भारत अनेकानेक राजनैतिक प्रयोगों से गुजरा परंतु देश की जनता को कोई विशेष लाभ नहीं मिला। गांधीवादी नीति विफल हो गई। पंडित जवाहर लाल नेहरू का समाजवादी पद्धति का समाजवाद भी देश की मेहनतकश जनता को राहत देने में असफल रहा। देश में गरीबी,बेरोजगारी,अशिक्षा,निरक्षरता,कुस्वास्थ्य का उन्मूलन तो नहीं किया जा सका परंतु भ्रष्टाचार अवश्य अपनी तीव्र गति से चल पड़ा। पिछले एक दशक में जितने किसानों ने आत्महत्यायें कीं,जितनी बेरोजगारी बढ़ी,अमीरी और गरीबी का जितना अंतर बढ़ा,भ्रष्टाचार जिस ऊंचाई पर पहुंच कर तांडव कर रहा है उतना कभी भी नहीं हुआ। वास्तव में सत्ताधारी राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग पूंजीपतियों और साम्राज्यवादी ताकतों से गठजोड़ कर जनता को सामाजिक एवं आर्थिक मुक्ति नहीं दिला सकता। इसी पृष्ठभूमि में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के विचार,उनकी मान्यताएं, उनके सुझव एवं उनके द्वारा बताए गए रास्ते आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। गरीबी,बेरोजगारी,निरक्षरता,भ्रष्टाचार आदि समस्याओं पर विजय प्राप्त करने के लिए हमें नेता जी सुभाषचन्द्र बोस द्वारा दिखाए गए समाजवादी पुनर्निर्माण के रास्ते को अपनाना होगा।