Saturday , 20 October 2018

राहुल जी ! हाफिज सईद की रिहाई मोदी की विफलता कैसे ?

 डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद की पाकिस्तान में रिहाई वस्तुतः विश्व  समुदाय की चिंता होनी चाहिए। अनेक देशों ने इसपर पार्टी लाइन से ऊपर उठकर चिंता भी व्यक्त की है। उसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने आतंकवादी घोषित किया था। दस मिलियन डॉलर अर्थात पैसठ करोड़ रुपये का इनाम रखा गया था। अतः उसका रिहा होना केवल भारत की समस्या नहीं है।

अमेरिका में कांग्रेस के उस निर्णय की आलोचना हो रही है, जिसमें पाकिस्तान को सहायता  के लिए लगाई गई शर्ते शिथिल की गई थीं। वैसे वहां के सत्ताधारी और विपक्षी दोनों दलों ने हाफिज की रिहाई को अनुचित कहा है। जबकि भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने इसे लेकर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोल दिया है। राहुल विरोध की इस धुन में भूल जाते है कि इसकी गूंज कहा तक जाएगी। राहुल ने मोदी की विदेश नीति को विफल घोषित कर दिया। आखिर ऐसे वैश्विक और संवेदनशील मसले पर राजनीति कर राहुल गांधी दुनिया को क्या सन्देश देना चाहते हैं? मुख्य सन्देश तो यही गया कि भारत में आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रीय सहमति नहीं है। राहुल को बताना चाहिए कि मुम्बई हमले के बाद से छह वर्षो तक उनकी सरकार इस मसले पर कितनी सफल थी।

पाकिस्तानी निजाम की असलियत एक बार फिर सामने आ गई। वहां की एक अदालत ने आतंकी सरगना हाफिज सईद को रिहा कर दिया। यह फैसला न्यायपालिका का था। उसने मौजूदा प्रमाणों का संज्ञान नहीं लिया। कार्यपालिका अर्थात सरकार ने उसके खिलाफ नए सिरे से आरोप पत्र दाखिल करने से इनकार कर दिया। इसके अलावा व्यवस्थापिका अर्थात नेशनल असेंबली में भी आतंकी की रिहाई पर खुश होने वाले प्रतिनिधि मौजूद हैं। यह वहां के शासन के तीनों अंगों की दशा है। किसी में भी आतंकवाद को समाप्त करने की  इच्छाशक्ति नहीं बची है। सेना के वर्चस्व ने इनको इस मामले में नकारा बना दिया है।

इसके पहले भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को अदालत द्वारा मृत्युदंड देने में भी यही हुआ था। उन्हें ईरान सीमा से पकड़ा गया था, जहाँ वह निजी व्यापार के सिलसिले में गए थे। पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया। भारत को बदनाम करने के लिए उन पर जासूसी का आरोप लगाया और सैनिक अदालत ने उन्हें मृत्युदंड दे दिया। पाकिस्तान के हौसले बुलंद करने में अमेरिका और चीन भी बहुत जिम्मेदार हैं। चीन तो पाकिस्तानी आतंकी का  सुरक्षा परिषद तक में खुलेआम बचाव करता है। अमेरिका  की कांग्रेस ने कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान को सहायता देने के लिए लागू शर्तों को लचीला बनाया है। पहले शर्त यह थी कि पाकिस्तान हक्कानी और लश्कर तैयबा के  खिलाफ कार्रवाई करेगा तभी उसे सहायता दी जाएगी। लेकिन, अब इससे  लश्कर को बाहर कर दिया गया।

अमेरिकी कांग्रेस यह भूल गई कि ऐसी सोच ने ही उसपर आतंकी  हमले का रास्ता तैयार किया था।  अमेरिका, योरोप के देश निश्चिंत थे कि इस्लामी आतंकवाद पाकिस्तान के पड़ोसी देशों की समस्या है।  लेकिन इससे अमेरिका भी शिकार बना।  योरोप भी सुरक्षित नहीं रहा।  एक बार फिर अमेरिकी कांग्रेस के वही गलती दोहराई है।

लेकिन इससे यह नहीं मानना चाहिए कि भारत अमेरिका के संबन्ध खराब हो गए हैं।  अमेरिका प्रजातांत्रिक देश है। व्यवस्थापिक और कार्यपालिक में मतभेद पहले भी होते रहे हैं।  लेकिन यह मानना होगा राष्ट्रपति ट्रम्प भारत से रक्षा सहित कई अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हैं। अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया के बीच संयुक्त सहयोग की स्थापना महत्वपूर्ण है। अब जो विपक्षी हाफिज की रिहाई को मोदी सरकार की कूटनीतिक विफलता मान रहे हैं, वह अपनी संकीर्ण सोच का ही प्रदर्शन कर रहे हैं। हाफिज सईद सिर्फ भारत की नहीं, दुनिया की समस्या है। इस रिहाई के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को चेताया है। उम्मीद ऐसी है कि वैश्विक दबाव के आगे पाकिस्तान को झुकना पड़ेगा और एकबार फिर वो हाफिज को हिरासत में लेने के लिए विवश होगा।