Thursday , 18 October 2018

पवन ऊर्जा के क्षेत्र में मसूरी विधायक के बढ़ते कदम

यदि पवन ऊर्जा  के इतिहास पर नजर डाले तो एक अलग ही परिदृश्य  देखने को मिलता है। प्राचीन मिश्र के निवासी नील नदी में अपनी नावों के परिचालन के लिए पवन ऊर्जा का प्रयोग करते थे.  माना जाता है कि इसकी परिकल्पना आज से लगभग 4000 ई0पू0 की होगी। पवन शक्ति  से विद्युत उत्पादन का प्रयोग पहली बार 1887 में स्टाटलैंड में किया गया, उस वक्त डाइनेमो के द्वारा विद्युत बनाने में इसका प्रयोग किया जाता था।
           इस तथ्य से कोई भी अन्जान नहीं है कि उत्तर  भारत में इस प्रकार की तकनीकियों का इस्तेमाल न के बराबर होता है। यह भी सत्य है कि पवन शक्ति  की ऊर्जा गतिज ऊर्जा होती है एवं वायु के वेग में कमी या बढ़ोतरी होने पर पवनचक्कियां ठीक तरीके से कार्य नहीं करती।
           यदि वायु की गति 320 किलोमीटर प्रतिघंटा होगी तो वह पवनचक्की के संचालन में बाधा करेगी एवं वायु की गति 48 किमी0 प्रति घंटा होती है तो इस स्थिति में भी कार्य करना जटिल होगा।
           अन्य देषों के परिपेक्ष में देश के साथ-साथ उत्तर  भारत में भी पवन शक्ति  का व्यवसायिक विकास नहीं हो पाया। ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि उत्तर भारत में पवन ऊर्जा से विद्युत उत्पादन की परिस्थितियां न हो  बल्कि यह इस वजह से नहीं हो पाया क्योंकि यहां की सरकारों एवं जनप्रतिनिधियों द्वारा इनकी कोई परिकल्पना की ही नहीं गई।
            पवन ऊर्जा के महत्व पर भी प्रकाश डालना आवश्यक  होगा क्योंकि पवन ऊर्जा के लाभ अन्य प्रकार के विद्युत उत्पादन के तरीकों से मात्रात्मक तौर कहीं ज्यादा भी एवं गुणात्मक तौर पर ज्यादा परिष्कृत भी। पनन ऊर्जा से उत्पादित विद्युत की सबसे पहली खूबी तो यही है कि यह हरित यानि ग्रीन एनर्जी है, यह स्वच्छ ऊर्जा है, इससे असीमित आपूर्ति प्राप्त की जा सकती है, यह एक सुरक्षित ऊर्जा विकल्प है, तुलनात्मक तौर कम स्थान पर स्थापना, जलविद्युत ऊर्जा की तुलना में बहुत ही कम समय में स्थापित हो जाती है एवं स्थापना के साथ ही उत्पादन का उपयोग किया जा सकता है, बंजर, परती, बेकार पड़ी हुई जमीनों पर आसानी से स्थापित की जा सकती है तथा इसे स्थापित करने के बाद क्षेत्र और सुंदर भी लगता है, बेहद कम रखरखाव की कम आवश्यकता  सहित रखरखाव का खर्च भी कम है।
             विडम्बना यह है कि इनती उत्पादक तथा किफायती पवन ऊर्जा द्वारा विद्युत उत्पादन भारत में कुल बिजली उत्पादन का 1 प्रतिशत भी नहीं होता, लेकिन यह सत्य है कि आने वाले समय में पवन शक्ति  ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। यह भी विदित है कि तमिलनाडु देश का सबसे अग्रणी पवनशक्ति  राज्य है।
             अब इस कड़ी में मसूरी विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के विधायक गणेश जोशी  द्वारा पवन ऊर्जा के विकास हेतु क्षेत्र में अपनी विधानसभा क्षेत्र के ऊॅचाई वाले स्थानों को चुना है। एक अनौपचारिक वार्ता में उन्होनें कहा कि वह मसूरी, सुवाखोली एवं बुरासंखण्डा को पवन शक्ति  क्षेत्र के रुप मे विकसित करना चाहते हैं। हालांकि अभी इसे परवान चढ़ने में वक्त लग सकता है लेकिन यह योजना भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं  को संबोधित करने के लिए बेहद शानदार  विकल्प साबित होगी।
             उनका कहना है कि एक राजनीतिज्ञ के साथ-साथ सफल समाजसेवक भी होना आवश्यक  है क्योंकि राजनीति विचारों की होती है और समाजसेवा समर्पण भाव से। आज के समय के राजनीतिज्ञों को चाहिए कि उनके विचार भी भविष्योन्मुख  हों। उनके द्वारा कहा गया कि यदि तमिलनाडु देश  के शीर्ष स्थान पर रहकर पवन शक्ति  का केन्द्र बन सकता है तो क्यों ना हम अपने क्षेत्र के बारे में भी कुछ सोचें। उनका कहना है कि पवन ऊर्जा के क्षेत्र में मसूरी एवं आस-पास के क्षेत्र को भी विकसित किया जा सकता है। जिसका सबसे बड़े फायदा स्थानीय बेरोजगारों के रोजगार सृजन के रूप में होगा एवं दूसरा यह कि पवन ऊर्जा केन्द्रों से सटे गांवों को विद्युत सप्लाई भी की जा सकेगी। उन्होनें यह भी कहा कि पर्यावरणीय दृष्टि  से पवन शक्ति  एकदम साफ-सुथरी है।
             अंततः खुशी  की बात यह है कि विधायक गणेश जोशी  की जनहित में सकारात्मक सोच एवं  भविष्योन्मुख राजीनीतिक एवं विकास दृष्टिकोण  से मसूरी, सुवाखोली एवं बुरांसखण्डा को पवन ऊर्जा के केन्द्र के रुप में स्थापित करने की कवायत तो प्रारम्भ हुई।
                                                                           (लेखक मसूरी विधायक गणेश जोशी जी के निजी सचिव हैं)