Sunday , 21 October 2018

पहले भ्रष्टाचारी उंगलियों पर गिने जाते थे आज ईमानदार

कुलदीप नैयर 

मैं मधुर यादों की भावना सहित उन दिनों पर पुनः विचार करता हू जो भारतीय गणराज्य की स्थापना के समय विद्यमान थे। यद्यपि संविधान नवम्बर 1949 के अंत में स्वीकृत कर लिया गया था, किंतु उसका क्रियान्वयन 26 जनवरी, 1950 को हुआ था। उससे लगभग बीस वर्ष पूर्व रावी के तट पर भारत ने यह उद्घोषित किया था कि पूर्ण स्वतंत्रता ही उसका लक्ष्य है औपनिवेशिक स्तर की प्राप्ति नहीं। संविधान जैसा कि उसकी प्रस्तावना में कहा गया है लोगों को एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य प्रदान करना है। शब्द सेक्युलर (पंथ निरपेक्ष) आपातकाल के कुख्यात दिनों के दौरान जोड़ा गया था।

साठ वर्ष पूर्व प्रथम निर्वाचन 1951 में आयोजित हुआ था। वयस्क मताधिकार के आधार पर यह चुनाव हुआ और कोई शौक्षणिक बंधन भी मतदाता होने के लिए नहीं रखा गया। तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मानस में संभवतः अलाभकारी और प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझ रहे लोग ही रहे होंगे। उन्होंने यह आशा की होगी कि एक दिन आएगा जब वे भी हाथ मिला सकते हैं… वे ही देश में बहुमत में हैं− और भारत पर शासन करेंगे। मैंने कभी भी यह परिकल्पित नहीं किया था कि ऐसा हो पाना संभव है। किन्तु जब एक दलित, मायावती ने सर्वाधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में बहुमत पा लिया और वह राज्य की मुख्यमंत्री हो गयीं, तो मैंने यह मानना शुरू कर दिया है कि नेहरू ने जो आशा संजोई थी, वह एक दिन सत्य हो सकती है। अलाभकारी स्थिति वाले लोग और अल्पसंख्यक एकजुट हो सकते हैं और नई दिल्ली में सरकार गठित कर सकते हैं।
मगर पहले चुनाव के बाद भारत में मान्यता प्राप्त पश्चिमी संवाददाताओं ने दुर्भाग्य का भविष्य कथन किया और लिखा कि प्रथम निर्वाचन ही भारत का अंतिम चुनाव था। एक ने लिखा कि चुनाव के समय जो खलबली दृष्टिगोचर हुई, वह देश के टुकड़े कर देगी। मैं 25 वर्ष की आयु तक ‘द टाइम्स’ का स्ट्रिन्गर रहा हूं। मैंने उनसे प्रबल मतभेद व्यक्त किया था। किन्तु वह अपनी इस बात पर अड़े रहे कि जो चुनाव हुआ है, वह अंतिम है। आज वह अपने शब्दों पर पछताते हैं और मेरा दृष्टिकोण ही सत्य सिद्ध हुआ है।
दूसरे अमरीकी संवाददाता जो ‘वाशिंगटन पोस्ट’ से संबद्ध रहे उनका नाम है सालिग हैरीसन, उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी ‘डेन्जरेस डिकेड’ जिसमें यह भविष्यकथन किया था कि पचास के दशक के अंत तक भारत खंड खंडित हो जाएगा। मैंने उनके इस आकलन को भी चुनौती दी थी। उन्होंने अपनी गलती मान ली किंतु मैक्सवैल ने नहीं। मेरे विचार में पश्चिम अभी भी सराहना तो दूर भारत की सोच को समझ भी नहीं पा रहा है। यह एकताबद्ध नहीं रह सकता, यदि यह लोकतांत्रिक, सेक्युलर और खुलेपन से युक्त नहीं रहे। देश में एकता की जो अनुभूति है, वह किसी मत सिद्धांत पर आधारित नहीं है, उसकी विविधता ही वास्तविक शक्ति है और पारस्परिक समझबूझ की भावना ही उसकी आत्मा है, जिसकी झांकी सेक्युलरवाद में समाविष्ट है, यह विभिन्न क्षेत्रों और मत−मतान्तरों के लोगों को एकजुट रखती है।
चिंता का जो बिन्दु है, वह है आर्थिक उद्भव में समानता का नहीं होना और संविधान में न्याय की दृष्टि से समान व्यवहार और न्याय निष्पादन में समानता का जो आश्वासन दिया गया है उसका सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अभाव, सामाजिक और आर्थिक आजादी के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता ने राष्ट्र को हताश-सा किया है। माओवादी, जिन्होंने बंदूक संभाल ली है वे प्रासंगिक हो गए हैं, यद्यपि वे समस्या ही हैं, समाधान नहीं।
निःसंदेह लोग स्वतंत्रता और नियमित रूप से अपने शासकों को चुनने के विकल्प का उपयोग कर सकते हैं। किंतु यह अवसर पांच वर्ष में एक बार मिल पाता है। शेष अवधि में वर्गों, विशिष्ट वर्गों की बात ही चलती है। एक से दूसरे चुनाव तक के बीच की अवधि में विधायकों आदि को हम कहां तक और कैसे जवाबदेह बना सकते हैं? कुछ देशों ने अपनी जनता को उस स्थिति में चुने गए प्रतिनिधियों की वापसी का अधिकार दिया है यदि एक तिहाई मतदाता ऐसा चाहते हों। किंतु भारत एक विशाल देश है, जहां एक संसदीय क्षेत्र में दस लाख से भी अधिक तक मतदाता हैं। यहां एक तिहाई संख्या ही विपुल हो जाती है।
फिर हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि सत्ता जनता में निहित होती है? विकेन्द्रीकरण ही एक मात्र राह है। सत्ता का नई दिल्ली से राज्यों की राजधानियों और राज्यों की राजधानियों से ग्रामों में स्थानान्तरण हो। राजीव गांधी ने जो कुछ अच्छे काम किए उनमें से पंचायती राज एक है, लेकिन वह थैलीशाहों का बंदी हो गया है। सरकार न राजनीतिक दलों को ही उससे परे रख पाई है और न ही धनिकों को। और फिर आप उच्चतर ‘टीचरों’ उदाहरणतः जिला परिषदों के स्तर पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि उस स्तर पर धन और राजनीति ने इन चुनावों को हास्यास्पद-सा बना दिया है। जब संसद के चुनावों में दस करोड़ रुपए से अधिक तक खर्च होते हैं और पंचायत चुनाव में एक सीट पर लाखों रुपए के लगभग तो यही कहा जा सकता है कि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था धनिकों की है, धनिकों के लिए है और धनिकों द्वारा है।
मैंने कभी यह सपने में भी नहीं सोचा था कि भारत सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में से एक होगा। जवाहर लाल नेहरू ने अपने सहयोगी केडी मालवीय से, जो पेट्रोलियम मंत्री थे, कांग्रेस के नाम पर एक व्यापारी से धन लेने और कोई हिसाब न देने पर त्यागपत्र ले लिया था। उस समय सरकार और सार्वजनिक जीवन दोनों में ही भ्रष्ट जन उंगलियों पर गिने जा सकते थे। आज बात उलटी है, ईमानदार उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। और भ्रष्टाचार की राशि भी दिमाग चकरा देती हैं। कभी दूर−दूर तक भी मैं उसकी कल्पना नहीं कर सकता था। जैसे कि कभी मोबाइलों से संबंधित 2जी स्पेक्ट्रमों के कथित घोटाले के पौने दो लाख करोड़ रुपए तक की विपुल राशि तक पहुंचने के बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था। दरअसल एक सौ करोड़ रुपए का भ्रष्टाचार तो अब मूंगफली तुल्य माना जाता है।
हमारे समय भ्रष्ट और ब्लैक मार्केटियरों को एक दूरी पर रखा जाता था, क्योंकि कोई भी उनके साथ कंधे से कंधा भिड़ाकर अपनी प्रतिष्ठा गंवाना नहीं चाहता था। नेहरू ने यह निर्देश दिए थे कि वरिष्ठ अधिकारी किसी राजनयिक के द्वारा दी गई पार्टी में शामिल नहीं हों, जो उनके रैंक अथवा स्तर के समकक्ष नहीं हैं। आज सरकार में जो सचिव पद पर हैं, उन्हें दूतावास के तृतीय सचिव द्वारा आयोजित समारोहों में देखा जा सकता है, क्योंकि वहां जीभर कर पीने का अवसर उपलब्ध हो जाता है। मितव्ययता सर्वाधिक लापता है। अब तो कार भी बड़ी होनी चाहिए, मकान भी महल के तुल्य और वेशभूषा भी विदेशी ब्रांड की। पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो ने कम से कम पाकिस्तान में तो अवामी ड्रेस सलवार कमीज लागू की थी। बहुत से नौकरशाह वहां अब वह ड्रेस नहीं पहनते। पश्चिमी सूटों को भी दक्षिण एशिया की अफसरशाही में वरीयता दी जाती है। मुंबई में एक उद्योगपति ने लगभग 2,000 करोड़ रुपए की लागत से एक बहुमंजिली इमारत बनाई है। उसकी तुलना उस छोटी कुटिया से करें, जिसमें महात्मा गांधी जीवन भर रहे और उन्होंने हमें आजादी दिलाई, पश्चिम प्रेरित डॉक्टरों, अथवा अकादमीशियनों ने नहीं− जो ब्रिटिश सत्ता के पक्षधर थे।
आज भारत में हिंसा आम होकर रह गई है। शायद ही देश का कोई राज्य इससे अछूता होगा। लोग आज उग्रवादियों के जितना ही राजकीय आतंकवाद का भी निशाना बन रहे हैं। माओवादी बंदूक निंदनीय है तो राज्य की बंदूक भी− जो लोगों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को कुचलती हो।
विश्व के हमारे भाग में, अपकेंद्री (सेन्ट्रीफ्युगल) ताकतों द्वारा शोषण हमेशा ही एक खतरनाक संभावना रही है। वे राष्ट्र को विखंडित कर सकती हैं। और कौन जानता है कि कहां और कब हिंसा का अंत होगा, यह साधनों और साध्यों के बीच की बहस नहीं है। यह तो बंदूक बनाम बंदूक का सवाल है। अभी भी एक लम्बा सफर तय करना शेष है। मैं खंडित वादों और क्षत−विक्षत आशाओं के इस वियावान में खुद को एकाकी-सा महसूस कर रहा हूं।