Saturday , 19 October 2019

चांद पर मानव के 50 साल : आज ही के दिन बड़ा सपना हुआ था साकार

पांच दशक पहले 20 जुलाई, 1969 को नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रिन ने चांद पर पांव रख अंतरिक्ष और आकाशीय पिंडों से जुड़े हजारों सालों के मानवीय सपनों और आकांक्षाओं को पूरा होने का रास्ता खोल दिया था.  कुछ साल पहले भारतीय चंद्रयान भी पहुंच चुका है और इस साल के शुरू में चीनी सैटेलाइट ने चांद पर कपास का बीज भी अंकुरित कर दिखाया. अनंत आकाश को मापने और समझने की प्रक्रिया में नासा का वह सफल अभियान एक मील का शानदार पत्थर है. अपोलो-11 के यात्रियों के चांद पर उतरने से जुड़ी खास बातों का विवरण आज के इन डेप्थ में…

नासा के मून मिशन के रोचक तथ्य अपोलो 11 मिशन के अंतरिक्षयात्री नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रिन ने 50 वर्ष पूर्व जब चंद्रमा की सतह पर कदम रखा, तो टेलीविजन पर लाइव प्रसारण देख रहे 60 करोड़ लोग इसके गवाह बने. तब से इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर तमाम पुस्तकें लिखी गयी, टीवी शो, डाक्यूमेंट्री और फीचर फिल्में बनीं. हालांकि, अपोलो 11 से जुड़ी तमाम अभी जानकारियां स्पष्ट नहीं हैं या उनकी सही व्याख्या नहीं हो पायी है.

मिशन में राष्ट्रपति केनेडी की नहीं थी दिलचस्पी! तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने सार्वजनिक तौर पर अपने जोशीले भाषणों में कहा था कि मून मिशन की कामयाबी हमारी ऊर्जा और कौशल की उत्कृष्टता का प्रमाण है. लेकिन, निजी तौर पर एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह जमीनी चिंताओं को वे अधिक तवज्जो दे रहे थे. व्हाइट हाउस में 1962 में नासा प्रशासक जेम्स वेब के साथ बैठक में उन्होंने कहा था कि वे अंतरिक्ष में रुचि नहीं लेते. उन्होंने कहा था कि हम जो भी करते हैं, उसमें हमें रूसियों से आगे होना चाहिए. 

लैंजरी कंपनी ने बनाया था स्पेसशूट मून मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों के लिए स्पेसशूट बनाने का ठेका अंत:वस्त्र बनानेवाले कंपनी ‘प्लेटेक्स’ को दिया गया था. चंद्रमा के वायुविहीन और अत्यधिक तापमान वाली सतह के मुताबिक स्पेसशूट बनाने का निर्देश दिया गया था. साल 2011 में निकोलस डि मॉनकॉक्स ने किताब ‘स्पेसशूट’ में जिक्र किया है कि प्लेटेक्स को एरोस्पेस कंपनी हैमिल्टन स्टैंडर्ड के साथ मिलकर स्पेसशूट बनाने का निर्देश दिया गया था. प्लेटेक्स की औद्योगिक यूनिट आईएलसी डॉवर तब से नासा के प्रत्येक स्पेसशूट को डिजाइन करती है.

 नोक वाले कलम से बचे अंतरिक्ष यात्री लुनार मॉड्यूल के छोटे से दायरे में सावधानी सबसे अहम थी. इस दौरान आर्मस्ट्रांग के बैकपैक से इंजन आर्मिंग स्विच टूट गया, जो इंजन को स्टार्ट करने के लिए जरूरी था. मिशन कंट्रोल के पास इसका त्वरित उपाय नहीं था. लेकिन एस्ट्रोनॉट एेसी किसी समस्या का निदान करने में एक्सपर्ट होते हैं, लिहाजा एल्ड्रिन ने स्पेसशूट के पॉकेट से नोक वाला पेन निकाला और सर्किट ब्रेकर स्विच की जगह इसका इस्तेमाल किया. उन्होंने चंद्रमा की वापसी का जिक्र करते हुए इसकी जानकारी अपनी किताब में दी थी. 

अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा चंद्रमा में छोड़े गये सामान नासा द्वारा जारी कैटलॉग ‘मैनमेड मैटीरियल ऑन द मून’ के अनुसार अपोलो -11 के मून वाकर्स ने वोमिट बैग, दो यूरीन कलेक्टर और इस्तेमाल हो चुकी कुछ डिवाइसेस के अलावा अच्छी वस्तुओं को चंद्रमा पर छोड़ दिया था. इसमें दुनिया के 73 देशों के सदभावना संदेशों वाली सिलिकॉन ‘मेमोरियल डिस्क’ और भूकंप मापी आदि शामिल थे. नासा के अनुसार अपोलो के छह मिशन के दौरान मानव द्वारा ह्यूमन वेस्ट के कुल 96 बैग छोड़ गये हैं. 

मून प्लेग के भय से क्रू को दी गयी सुरक्षा चंद्रमा से वापसी के बाद नासा के वैज्ञानिकों ने लुनार जर्म्स के संभावित डर की वजह से विशेष सावधानी बरती. वापसी के तीन हफ्तों तक अपोलो क्रू को मोबाइल क्वारंटीन यूनिट में रखा गया. पहले उन्हें यूएसएस हॉर्नेट एयरक्राफ्ट कैरियर में और फिर पर्ल हार्बर पर रखा गया. कांच के बॉक्स में बंद क्रू के साथ राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की खींची गयी तस्वीरें भी जारी गयी.

अमेरिकी झंडे आज भी मौजूद नासा का लूनार रिकॉन्सेंस आर्बिटर अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लगाये गये अमेरिकी झंडों की छाया (कई अन्य कलाकृतियों के साथ) को देख सकता है. हालांकि, आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन द्वारा लगाया झंडा शामिल नहीं है. चंद्रमा की कठोर सतह पर दोनों ने झंडा लगाने की कोशिश की थी. एल्ड्रिन ने बाद कहा था कि सतह से चढ़ते हुए लूनार मॉड्यूल के रॉकेट निकास से टकराने बाद उसने झंडे को फहराया था.

नासा के मानव रहित अभियान अपोलो-4 : 9 नवंबर, 1967 को लॉन्च किया गया आपोलो-4, नासा के सैटर्न वी रॉकेट का पहला मानव रहित चंद्र अभियान था. कैनेडी स्पेस सेंटर से लॉन्च होनेवाला यह पहला रॉकेट था, जिसे एस्ट्रोनॉट को चांद पर भेजने के लिए विकसित किया गया था. यह अभियान सफल रहा था. सैटर्न वी की लंबाई 363 फुट थी और अपने समय का यह सबसे लंबा स्पेसक्रॉफ्ट था, जिसने उड़ान भरी थी. अपोलो-5 : अपोलो-4 की लॉन्चिंग के कुछ ही महीने बाद 22 जनवरी, 1968 को अपोलो-5 लॉन्च हुआ था. इस अभियान ने सफलतापूर्वक अपोलो लूनर मॉड्यूल की चंद्र सतह पर चढ़ने और उतरने की क्षमता की परख की थी. इस स्पेसक्रॉफ्ट को चंद्रमा के सतह पर उतरने के लिए डिजाइन किया गया था. अपोलो-6 : अपोलो-6 अभियान को 4 अप्रैल, 1968 को लॉन्च किया गया था. इसके लॉन्चिंग का उद्देश्य यह दिखाना था कि सैटर्न वी राॅकेट ट्रांस-लूनर इंजेक्शन के लायक है. लेकिन, शीघ्र ही इस सिस्टम में समस्या आ गयी और यह स्पेसक्रॉफ्ट कक्षा में नहीं भेजा जा सका. 

चंद्रमा पर 2024 के िमशन पर उठे सवाल            नासा के अंतरिक्षयात्री यूजिन केर्नन ने आखिरी बार 11 दिसंबर, 1972 को धूल भरी चंद्रमा की सतह पर पैर रखा था. आज 47 वर्ष बाद भी वह पदचिह्न हवा, वर्षा या मानव द्वारा अछूता है. हालांकि, नासा का दावा है कि अगले पांच वर्ष में ‘आर्टेमिस प्रोग्राम’ के तहत पुरुष और पहली महिला अंतरिक्ष यात्रियों का एक दल चंद्रमा की सतह पर उतरेगा.  नासा का यह भी कहना है कि यह मानव की यह स्थायी उपस्थिति होगी. इस योजना की सफलता को लेकर विशेषज्ञों का एक पक्ष आशंका जता रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने साल 1961 में पहली बार चंद्रमा पर मानव मिशन की घोषणा की थी, इसके आठ वर्ष बाद 1969 में चंद्रमा पर लैंडिंग हो सकी थी. नासा बीते दो दशकों से प्लान और प्रोग्राम के साथ इस पर चर्चा कर रहा है, लेकिन इस लंबित योजना का स्पष्ट खाका अभी तैयार नहीं हो सका है.

 अपोलो का पहला मानव चंद्र अभियान 21 दिसंबर, 1968 को लॉन्च हुए अपोलो-8 ने 24 दिसंबर को सफलतापूर्वक चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश किया था. यह पहला मानव युक्त यान था. वहीं अपोलो-10 के साथ लूनर लैंडिंग मॉड्यूल ले जाया गया था. इस यान को 18 मई, 1969 को लॉन्च किया गया था. 

 अपोलो-11 के बाद भी कई बार चंद्रमा पर पहुंचे अमेरिकी वर्ष 1972 में अपोलो प्रोजेक्ट की समाप्ति के पहले तक छह चंद्र अभियान के साथ दर्जनों मानव चंद्रमा पर पहुंचे. 20 जुलाई, 1969 को अपोलो -11 लूनर लैंडर इगल के चंद्रमा के सी ऑफ ट्रैंक्विलिटी को छूते ही नील आर्मस्ट्रॉन्ग और एडविन बज एल्ड्रिन चंद्रमा पर पहुंचनेवाले पहले अमेरिकी बन गये.  14 नवंबर, 1969 को अपोलो-12 लाॅन्च किया गया, जो 17 नंवबर को सफलतापूर्वक चंद्रमा के कक्ष में पहुंचा. इसका उद्देश्य चंद्र सतह के बारे में जानकारी जुटानी थी. 11 अप्रैल, 1970 को लॉन्च हुआ अपोलो-13 दुर्घटनाग्रस्त होने से बाल-बाल बच गया था. इसके ऑक्सीजन टैंक में ब्लास्ट हो गया. हालांकि, इसमें सवार अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित वापस आने में सफल रहे थे. 31 जनवरी, 1971 को लॉन्च किया गया, अपोलो-14, चार फरवरी को चंद्रमा के कक्ष में पहुंचा था. 26 जुलाई, 1971 को लॉन्च किया गया अपोलो-15 चंद्रमा की कक्षा में  29 जुलाई को पहुंचा था. यह चंद्रमा की सतह से सैकड़ों पाउंड नमूने एकत्रित कर धरती पर लाया था. पहली बार चंद्रमा पर ऑटोमोटिव व्हीकल चलायी गयी थी. 16 अप्रैल 1972 को लॉन्च हुआ अपोलो-16, चंद्रमा के कक्ष में 19 अप्रैल को पहुंचा था. चंद्रमा के ऊंचाई वाले क्षेत्र में चालक दल उतरे थे.7 दिसंबर, 1972 को अपोलो-17 लॉन्च किया गया. इस यान ने 10 दिसंबर को चंद्रमा के कक्ष में प्रवेश किया. यह आखिरी मानव युक्त अपोलो चंद्र अभियान था.

कभी चांद पर जीवन भी था! लंबे अरसे से माना जाता रहा था कि चांद एक ‘मृत पत्थर’ है, जहां वायुमंडल बनाने के लिए कोई ज्वालामुखीय गतिविधि नहीं है तथा पर्याप्त गुरुत्वाकर्षण के अभाव में अणु जमा नहीं हो सकते, जो जीवाणुओं के विकास के लिए जरूरी हैं. लेकिन बर्कबेक, लंदन और वाशिंग्टन स्टेट विश्वविद्यालयों ने उन स्थितियों का पता लगाया है, जिनके कारण करीब चार अरब साल पहले चंद्रमा पर सामान्य संरचना के जीवाणु हुआ करते थे.  यह लगभग वही समय था, जब धरती पर जीवन विकसित हो रहा था. दो कालों में चंद्रमा के गर्भ से पानी के भाप समेत बेहद गर्म गैस निकल रहे थे. इससे वायुमंडल का निर्माण हुआ तथा भाप घनीभूत होकर पानी के रूप में तलाबों में जमा हुआ. इससे सूक्ष्म जीवाणुओं को पनपने का मौका मिला. एस्ट्रोबायोलॉजी के शोध पत्र के अनुसार, यदि चांद पर पानी और वायुमंडल का अस्तित्व लंबे समय तक बचा रहता, तो वहां जीवन के कुछ अवधि तक बचे रहने की संभावना होती.   वर्ष 2009-10 में वैज्ञानिकों के एक दल ने चांद पर बर्फ होने के सबूत खोजे थे. माना जाता है कि थीया नामक ग्रह के पृथ्वी से टकराने से चांद बना था. चूंकि धरती पर चांद के कई उलका-पिंड हैं, सो मान्यता यह भी है कि चांद पर धरती से जीवन गया होगा. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि चांद की सतह पर खुदाई हो, तो धरती के शुरुआती जीवन के बारे में भी जानकारी मिल सकती है. करीब तीन अरब साल पहले चांद का तापमान ठंडा होने से गैसों का उत्सर्जन बंद हो गया तथा चुंबकीय आवरण के खत्म होने से हवाएं अणुओं को उड़ा ले गयीं. इससे जीवन की संभावनाएं पूरी तरह समाप्त हो गयीं. 

भारत का चंद्र अभियान भारत का पहला चंद्र अभियान, चंद्रयान-1, 22 अक्तूबर, 2008 को श्रीहरिकोट से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया था. इस यान को भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने तैयार किया था. यह यान चंद्र सतह से 100 किमी की ऊंचाई पर चंद्रमा की परिक्रमा कर रहा था. यह भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन व बुल्गारिया में बने 11 वैज्ञानिक उपकरण अपने साथ लेकर गया था. इस उपग्रह ने चंद्रमा के चारों ओर परिक्रमा की.  इस अभियान का समापन तब हुआ, जब 29 अगस्त, 2009 को अंतरिक्ष यान के साथ संचार समाप्त हो गया. इसरो ने चंद्रयान-2 को बीते 15 जुलाई को लांच करने की घोषणा की थी, लेकिन तकनीकी कारणों से लांचिंग रोक दी गयी. जल्दी ही इसे लांच किया जायेगा.

मून मिशन को झूठ भी मानते हैं कई लोग अमेरिका समेत दुनिया में बहुत से लोग मानते हैं कि सोवियत संघ को पीछे छोड़ने के लिए अमेरिका ने चांद पर अंतरिक्षयात्री भेजने का झूठ प्रचारित किया था. मान्यता है कि नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज एल्ड्रिन का वीडियो और फोटो हॉलीवुड या सैन्य ठिकाने में पर शूट किये गये थे. कुछ लोग मानते हैं कि इस कवायद में नासा को फिल्मकार स्टानली क्यूब्रिक की मदद मिली थी. वे 1968 में अंतरिक्ष अभियान पर आधारित फिल्म ‘2001- ए स्पेस ओडिसी’ बना चुके थे. झूठ माननेवालों का तर्क है कि चांद पर जो झंडा एल्ड्रिन लगा रहे हैं, वह फहरता हुआ दिख रहा है और हवा नहीं होने के कारण ऐसा होना मुमकिन नहीं है.  नासा ने स्पष्ट किया है कि सही जगह चुनने के क्रम में झंडा लहराता दिख रहा है. कुछ लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि पहले मून मिशन में हुई आग दुर्घटना में मारे गये तीन अंतरिक्षयात्रियों की हत्या अमेरिकी सरकार ने की थी, क्योंकि उन्हें सच का पता चल गया था.  नासा के बार-बार सही जानकारी देने के बाद भी मिशन को फर्जी माननेवाले शंकाओं पर अड़े हुए हैं. इंटरनेट पर ऐसे हजारों वीडियो, पॉडकास्ट और लेख मौजूद हैं, जो शंकाओं का प्रचार करते रहते हैं.